कुनबी मराठा समाज की शादी सिर्फ रस्मों का सिलसिला नहीं होती, बल्कि यह अपने कुल देवता, पूर्वजों और परंपराओं से जुड़ने का एक भावनात्मक अवसर भी होती है।
आज के समय में जहां बहुत सी पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही हैं, वहीं मंढविनी (भाल देव) पूजा जैसी रस्में हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखती हैं।
अगर आपने कभी गांव में मंडप के दिन का माहौल देखा हो, तो आपको जरूर याद होगा—जब पूरे घर में पूजा की तैयारी, अनाज की खुशबू और एक अलग ही शांति का अनुभव होता है। यही वह पल होता है, जब परिवार अपने देवताओं और पूर्वजों को विवाह में आमंत्रित करता है।
लोनारी कुनबी मराठा समुदाय (Lonhari Kunbi Mratha Samuday) में, इस रस्म का पालन अत्यंत श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों को कड़ाई से पालन के साथ किया जाता है।
मंढविनी या भाल देव पूजा क्या है?
मंढविनी या भाल देव पूजा, लोनारी कुनबी मराठा समुदाय की एक बेहद महत्वपूर्ण परंपरा है, जो मंडप के दिन स्नान के बाद की जाती है।
इस पूजा में परिवार अपने कुल देवता और पूर्वजों (पुर्वोज) को याद कर उनका आह्वान करते है, ताकि वे विवाह समारोह में उपस्थित होकर नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद दें।
सरल शब्दों में कहें तो:
यह रस्म अपने देव और पूर्वजों को शादी में शामिल करने का निमंत्रण है।
और पढ़े:- खन मिट्टी रस्म: कुनबी मराठा शादियों की महत्वपूर्ण रस्मों मे से एक। Khanmitti in hindi।
पूजा की तैयारी कैसे की जाती है?
इस रस्म की तैयारी बहुत सादगी लेकिन गहरे भाव के साथ की जाती है।
पूजा स्थल के पास एक धागे में आकुआ (आक) के फूल और नारियल बांधकर टांगा जाता है। यह सुरक्षा और शुभता का प्रतीक होता है।
इसके बाद गेहूं या चावल से एक रास (लेप) तैयार किया जाता है, जिस पर देवताओं को स्थापित किया जाता है।
इस रास पर पहले एक लाल कपड़ा बिछाया जाता है, जिसे खरवा कहा जाता है।
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि
“खरवा बिछाना मतलब देवताओं को सम्मानपूर्वक आसन देना।”
कुल देवता पूजा की पूरी विधि (Step-by-Step)
1. देवताओं की स्थापना और स्नान
सबसे पहले देवताओं को रास पर बैठाया जाता है। फिर उन्हें स्नान कराया जाता है और उनका तीर्थ (पवित्र जल) घर के सभी सदस्यों में बांटा जाता है।
यह एक बहुत भावुक पल होता है, जहां हर व्यक्ति मन ही मन आशीर्वाद मांगता है।

2. सिंदूर और तेल का महत्व
देवताओं को तेल में भिगोकर उन पर हनुमान जी वाला सिंदूर लगाया जाता है।
यह शक्ति, सुरक्षा और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है—
जैसे हम कहते हैं, “सब मंगल हो, कोई बाधा न आए।
3. दीप और पूजा व्यवस्था
रास के चारों कोनों पर तांबे के लोटे रखे जाते हैं और उनके ऊपर दीप जलाए जाते हैं।
सामने भी एक लोटा और दीप रखा जाता है।
यह व्यवस्था चारों दिशाओं में सकारात्मक ऊर्जा फैलाने का संकेत देती है।
4. नारियल अर्पण
पूजा के दौरान सभी देवताओं के नाम से नारियल चढ़ाया जाता है और फिर उन्हें फोड़ा जाता है।
यह त्याग, समर्पण और नई शुरुआत का प्रतीक है।
और पढ़े:- Push Mahine Me Shadi Kyu Nahi Hoti? परंपरा, धार्मिक मान्यता और विवाह नियम।
मंडप में देवताओं को ले जाने की परंपरा

पूजा के बाद एक बड़े देव को बांस के झिबे (प्लेट) में रखा जाता है।
फिर पाँच अलग-अलग गोत्र (कूर) के पुरुष मिलकर उन्हें मंडप के बीच में लेकर जाते हैं।
इस दौरान:
- वे दाईं दिशा में घूमते हैं
- पानी डालते जाते हैं
- “कुल-कुल” बोलते हैं
- और पांच फेरे लगाते हैं
यह दृश्य शादी में देखने लायक होता है—
ढोल की आवाज, लोगों की श्रद्धा और एकता साफ दिखाई देती है।
पूजा के बाद देवताओं को कैसे रखा जाता है?
पूजा के बाद सभी देवताओं को एक बांस की पेटी या डिब्बे में लाल कपड़ा (खरवा) बिछाकर स्थापित किया जाता है।
फिर उसे बंद करके लाल कपड़े से बांध दिया जाता है और एक सुरक्षित स्थान पर रखा जाता है—अक्सर मंडप में ही।
यह इस बात का संकेत है कि
देवता पूरे विवाह के दौरान उपस्थित हैं।
रास (अनाज) का महत्व – खेती से जुड़ा विश्वास
जो रास (गेहूं) देवताओं की पूजा में उपयोग किया जाता है, उसे देवताओं की पूजा होने के बाद घर की सबसे बड़ी महिला के पल्लू में डाल दिया जाता है। फिर वो महिला उस अनाज को घर की अनाज की कोठी में डाल देती है।
यह एक बहुत सुंदर परंपरा है, खासकर किसान परिवारों के लिए।
मान्यता है कि:
ऐसा करने से घर में कभी अनाज की कमी नहीं होती।
यह रस्म सीधे-सीधे हमारे खेती जीवन और प्रकृति से जुड़े विश्वास को दर्शाती है।
इस रस्म का आज के समय में महत्व
आज के युवा कई बार इन रस्मों को सिर्फ “पुरानी परंपरा” मान लेते हैं, लेकिन अगर गहराई से देखें तो:
- यह हमें अपने पूर्वजों से जोड़ती है,
- परिवार में एकता और जिम्मेदारी सिखाती है,
- खेती और प्रकृति के प्रति सम्मान बढ़ाती है,
- और सबसे जरूरी—यह शादी को सिर्फ इवेंट नहीं, एक संस्कार बनाती है
असल में,
यह रस्म हमें बताती है कि हम कहां से आए हैं और हमें अपनी जड़ों को क्यों नहीं भूलना चाहिए।
इस अनुष्ठान के दौरान सावधानियाँ
मांडविनी या भाल देव (Mandhavini/Bhal Dev) अनुष्ठान करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है।
सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात यह सुनिश्चित करना है कि यह अनुष्ठान किसी ऐसे अनुभवी व्यक्ति द्वारा संपन्न कराया जाए, जिसे धार्मिक विधियों का उचित ज्ञान हो।
पूजा (आराधना) में उपयोग होने वाली सभी सामग्री शुद्ध और स्वच्छ होनी चाहिए। धार्मिक अनुष्ठानों में स्वच्छता को विशेष महत्व दिया जाता है।
इसके अतिरिक्त, अनुष्ठान के दौरान घर का वातावरण शांत और श्रद्धापूर्ण बना रहना चाहिए, ताकि पूजा की पवित्रता बनी रहे।
निष्कर्ष
कुल देवता पूजा (मंढविनी / भाल देव) सिर्फ एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि कुनबी मराठा समाज की आत्मा है।
यह हमें अपने पूर्वजों के आशीर्वाद, खेती की परंपरा और परिवार की एकता का महत्व समझाती है।
आज जरूरत है कि हम इन रस्मों को समझें, अपनाएं और अपनी अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं—ताकि हमारी पहचान हमेशा जीवित रहे।
अगर आपने यह रस्म कभी देखी है, तो अपने अनुभव जरूर शेयर करें—क्योंकि हर घर की कहानी थोड़ी अलग, लेकिन भाव एक ही होता है।
सुझाव और सहयोग:
यदि इस लेख में दी गई कोई जानकारी अधूरी या गलत लगे, तो कृपया हमें अवगत कराएँ। आपके सुझाव हमें समाज से जुड़ी सही और प्रामाणिक जानकारी साझा करने के लिए प्रेरित करते हैं। लेख अच्छा लगे तो शेयर करें ❤️ और यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आए, तो आपका छोटा-सा सहयोग हमारे लिए बड़ी प्रेरणा होगा। 🙏

FAQ
मांधविणी भाल देव रस्म क्या होती है?
मांधविणी भाल देव कुनबी मराठा समाज की शादी की एक महत्वपूर्ण पारंपरिक रस्म है, जिसमें विवाह से पहले देवताओं का आह्वान कर उनसे आशीर्वाद लिया जाता है, ताकि शादी के सभी कार्य बिना किसी बाधा के पूरे हों।
मांधविणी या भाल देव रस्म का क्या महत्व है?
इस रस्म का मुख्य उद्देश्य देवी-देवताओं को आमंत्रित करना और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना होता है। यह परिवार के लिए सुख, शांति और समृद्धि की कामना का प्रतीक है।
इस रस्म में किन चीजों का उपयोग किया जाता है?
मांधविणी भाल देव में सुपारी, पान, अक्षत (चावल), नारियल, कलश और पूजा की अन्य सामग्रियों का उपयोग किया जाता है, जो शुभता और पवित्रता का प्रतीक होती हैं।
क्या मांधविणी भाल देव रस्म हर शादी में जरूरी होती है?
हाँ, पारंपरिक रूप से यह रस्म बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इसे विवाह की शुभ शुरुआत का आधार माना जाता है।
