कुनबी मराठा समुदाय के विवाह संस्कार अपनी सादगी, संस्कृति और पारिवारिक अपनत्व के लिए प्रसिद्ध हैं। हर रस्म के पीछे एक सुंदर संदेश और गहरी भावनाएं छिपी होती हैं।
इन्हीं में से एक है “चट–पुन (Chat-Pun)”, जो दूल्हे–दुल्हन के परिवारों के बीच प्रेम, मान–सम्मान और रिश्तों की मिठास बढ़ाने वाली परंपरा मानी जाती है।
चट–पुन रस्म क्या है?
चट–पुन एक पारंपरिक विवाह रस्म है जिसे दूल्हा–दुल्हन की बहन और जीजा जी द्वारा किया जाता है। यह रस्म बहन और जीजा के रिश्ते, साला–जीजा के मजाकिया अपनत्व और पारिवारिक बंधन को मजबूत करने का प्रतीक है।
इस रस्म में मिठास, खेल, हंसी–मजाक और धार्मिक महत्व, तीनों का सुंदर मेल देखने को मिलता है।
चट–पुन रस्म की तैयारी कैसे होती है?
इस रस्म में दो नांगोरी (चौक) बनाई जाती हैं। यह चौक निम्नानुसार तैयार होती है:
नांगोरी पर रखी जाने वाली वस्तुएं:
- विवाह में मुंडा–मुंडी की बची लकड़ियों से बने दो पटे
- पटों पर दुल्हे या दुल्हन की बहन और जीजा जी का खड़ा होना
- जीजा जी के पैर के नीचे रखने के लिए
- गुड़
- फूटा हुआ नारियल (खोबडा)
इन तैयारियों के साथ रस्म की शुरुआत होती है।
चट–पुन रस्म की विस्तृत प्रक्रिया

1. बहन और जीजा जी का पटों पर खड़ा होना
दोनों अपने-अपने पटों पर नांगोरी में खड़े होते हैं जिससे रस्म की पवित्रता और संतुलन का प्रतीक बनता है।
2. जीजा जी के पैर के नीचे गुड़ और नारियल रखना
जीजा जी के बाएँ पैर के नीचे गुड़ और खोबड़ा (नारियल) रखा जाता है।
यह मिठास, शक्ति, समृद्धि और दामाद–साले के संबंध की शुभता दर्शाता है।
3. लकड़ी और धागे वाला मुख्य विधि-क्रम
इसके बाद:
- जीजा जी के दाएँ कान के ऊपर और
- दाएँ पैर के नीचे एक–एक लकड़ी रखी जाती है।
इन दोनों लकड़ियों पर कच्चा धागा लपेटा जाता है।
धागा ऊपर कान से शुरू करते हुए नीचे पैर तक लपेटा जाता है। यह प्रक्रिया 5 से 7 बार दोहराई जाती है।
हर दौर के दौरान दूल्हा–दुल्हन की बहन इस धागे को हाथ लगाती है, जिससे वह अपने भाई और बहन के विवाह की मंगलकामना व्यक्त करती है।
कच्चे धागे का महत्व

इस रस्म में उपयोग किया गया कच्चा धागा अत्यंत पवित्र माना जाता है।
- इस धागे से देवस्थान में रखा दिया विवाह के दिन जलाया जाता है।
- यह दिया तब तक जलता रहना चाहिए जब तक दूल्हा–दुल्हन विवाह के बाद घर वापस नहीं आ जाते।
- यह नवविवाहितों की सुरक्षा, शुभता, आशीर्वाद और मंगल की कामना का प्रतीक है।
साले द्वारा नारियल निकालने की परंपरा
चट–पुन रस्म का सबसे रोचक हिस्सा यही होता है:
- जीजा जी के पैर के नीचे रखा नारियल साले द्वारा निकाला जाता है।
- इसमें हल्के-फुल्के खेल, मजाक और आनंद का माहौल होता है।
- जीजा जी कोशिश करते हैं कि नारियल आसानी से निकल न पाए, जबकि साला पूरी मेहनत लगाता है।
जब साला नारियल निकालने में सफल होता है, यह शुभ माना जाता है।
जीजा जी द्वारा साले को उपहार (भेट)
रस्म पूरी होने के बाद:
- जीजा जी अपने साले को
- कुछ धनराशि, या
- कोई उपहार देते हैं।
इसे प्रेम, आदर और रिश्तों को मजबूत करने का प्रतीक माना जाता है।
चट–पुन रस्म का सांस्कृतिक महत्व
- साला–जीजा के रिश्ते में मिठास बढ़ाना
- बहन–जीजा के बंधन को मजबूत करना
- परिवार के सामूहिक आनंद को बढ़ाना
- विवाह के शुभ कार्य को धार्मिक और सांस्कृतिक आधार देना
- नई गृहस्थी के लिए मंगलकामनाएँ व्यक्त करना
निष्कर्ष
चट–पुन सिर्फ एक रस्म नहीं बल्कि कुनबी मराठा समाज की परंपराओं में रचा-बसा पारिवारिक सामंजस्य, अपनत्व और शुभता का अनोखा संगम है। यह रस्म न सिर्फ मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि इसमें धार्मिकता, पवित्रता और रिश्तों की गहराई भी समाई हुई है।
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